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जानिये कैसे कानपुर के सत्ती चौरा घाट का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हुआ

कानपुर आज एक तेज़ रफ़्तार वाला औद्योगिक शहर बन गया है, लेकिन इस शहर में स्वतंत्रता संग्राम की कई कहानियां हैं, जिन्होंने कानपुर के नाम को इतिहास के अहम् पन्नो में दर्ज करवा दिया है।

Aastha Singh

कानपुर जो की पहले कॉनपोर (Cawnpore) के नाम से जाना जाता था, वह ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का गढ़ था। गंगा किनारे स्थित कानपूर 19वीं शताब्दी में एक आवश्यक व्यावसायिक रिवर पोर्ट था और अनाज के व्यापार का केंद्र था। जब हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बारे में सोचते हैं तब अमूमन कानपुर शहर का नाम दिमाग में पहले नहीं आता। 1857 के जून तक भारतीय विद्रोह मेरठ, आगरा, मथुरा, लखनऊ, कानपूर के कई इलाकों में फैल गया था, और कानपूर भी इतिहास के सबसे भीषण रक्तरंजित घटना का साक्षी बना।

तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध के बाद, मराठा शासक पेशवा बाजीराव द्वितीय को बिठूर में निर्वासित कर दिया गया था। पेशवा की कोई अपनी औलाद नहीं थी , इसीलिए उन्होंने नाना धोंडू पंत (बाद में जिन्हे ‘नाना साहब पेशवा’ के नाम से जाना गया) को गोद लिया लेकिन उसी समय कंपनी ने डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स (Doctrine of lapse) लागू कर दी, और नाना को कानूनी उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया, और ऐसा माना गया की राज्य समाप्त हो जाएगा और ब्रिटिश साम्राज्य में संलग्न हो जाएगा। यह बात नाना साहब को हरगिज़ बर्दाश्त नहीं हुई, और उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ सेना को तैयार करना प्रारम्भ कर दिया।

फिर कानपुर में 4 जून 1857 को युद्ध शुरू हुआ, और नाना ने अंग्रेज़ों के ख़ज़ाने के भण्डार को लूट लिया और फिर पहिया वाहनों वाली सेना पर सीधा हमला कर दिया। नाना ने वीरतापूर्ण युद्ध करके अंग्रेज़ों की सेना की गिनती को 250 तक सीमित कर दिया, और ब्रिटिश कंपनी को आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया।

इसके बाद समझौते से ऐसा निर्णय लिया गया, की ब्रिटिश और उनके परिवार इलाहाबाद से नाव से 27 जून 1857 को निकल जाएंगे और नाना साहेब ने अपनी सेना को किसी को हानि न पहुंचाने का आदेश दिया था।

जैसे ही अंग्रेज़ अपने परिवारों के साथ सत्ती चौरा घाट पर नावों में बैठने लगे वैसे ही खबर आयी की ब्रिटिश सेना के कमांडर ने बनारस में बेगुनाह भारतीय लोगों को मार दिया है, और इस बात से क्रोधित भारतीयों ने नावों में बैठे अंग्रेज़ों पर गोलियों से हमला कर दिया। जो ब्रिटिशर्स गोलियों से बच गए वे तलवार की धार से मारे गए। पुरुष महिलाएं और बच्चे सहित करीब 300 लोगों ने अपनी जान गवायीं। इसी लहूलुहान घटना के बाद इस घाट का नाम मैसेकेर घाट पड़ा।

कानपुर में नाना साहिब की सेना ने घेराबंदी कर ली थी, जिसके बाद आपस में एक संग्धि की गयी थी। कानपुर में हुई घटना से अंग्रेज काबू खो बैठे और जनरल हेनरी हेवलॉक ने नाना साहब की सेना को बंदी बना दिया। इससे उत्तेजित भारतीयों ने बीबीघर में शरणार्थी अंग्रेज़ों को मार डाला और उनकी लाशों को कुएं में फ़ेंक दिया। इस घटना को बीबीघर हत्याकांड कहा जाता है। जैसा किस्मत को मंज़ूर था घाट पर हमले से बचे ब्रिटिशर्स बाद में बीबीघर हत्याकांड में मारे गए। यह विद्रोह नाना साहब के नेतृत्व में किया गया था, इसीलिए स्वतंत्रता मिलने के बाद बीबीघर को नाना राव पार्क के नाम से नामांकित किया गया।

कानपुर का सत्ती चौरा घाट भयंकर हत्याकांड का मूक दर्शक रहा है, लेकिन आज यहां पर स्थित सफ़ेद मंदिर से घाट पर जो शांतिपूर्ण माहौल रहता है वह किसी विडंबना से कम नहीं। इन घटनाओं ने वास्तव में बड़े पैमाने पर स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया और कानपुर का नाम इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रक्त से लिख दिया गया।

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