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कानपुर में ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन के अंतिम अवशेषों में से एक है ‘लाल इमली मिल’ का औद्योगिक इतिहास

1950 के दौरान लाल मिल के पास 65000 मीटर कपड़ा उत्पादित करने की क्षमता थी, एक लंबाई जो लगभग कानपुर और हमीरपुर को जोड़ने वाली सड़क को कवर कर सकती है।

Aastha Singh

लाल इमली की शानदार लाल ईट की दीवारों के नज़दीक 128 फ़ीट का क्लॉक टावर, जहाँ एक सदी पहले कारखाने के मजदूरों के लिए अलार्म बजता था। आज भी कपड़े के निर्माण के साथ कानपुर के प्रयासों का साक्ष्य बनकर स्थापित ‘लाल इमली मिल’ द्वारा उत्पादित कपड़ो के उत्पादों ने 20वीं शताब्दी के मध्य में महान ऊंचाइयों को छुआ। वास्तव में इसकी लोकप्रियता ने इसकी मूल कंपनी कॉनपोर वूलेन मिल्स (Cawnpore woolen mills) को भी पीछे छोड़ दिया, क्यूंकि कॉनपोर वूलेन मिल्स भी ग्राहकों के बीच लाल इमली मिल्स से ही प्रसिद्द थी। तो चलिए इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं की क्यों कानपुर के लोग आज भी लाल इमली की कहानियां कहते हुए गौरवान्वित महसूस करते हैं।

गुणवत्ता की गारंटी के साथ लोकप्रियता

1950 के दौरान लाल मिल के पास 65000 मीटर कपड़ा उत्पादित करने की क्षमता थी, एक लंबाई जो लगभग कानपुर और हमीरपुर को जोड़ने वाली सड़क को कवर कर सकती है। इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि मिल ने ‘मेरिनो ऊन’ से बने उच्चतम गुणवत्ता वाले ऊनी कपड़े बनाने के लिए 24 घंटे के लिए तीन शिफ्टों में 10,000 श्रमिकों को नियुक्त किया। विदेशी तटों को एक्सपोर्ट किए जाने वाले वूलेन निर्माण के अलावा, लाल इमली ने विभिन्न प्रयोजनों के लिए सेना द्वारा उपयोग किए जाने वाले कपड़ों का भी निर्माण किया। ‘मेरिनो ऊन’ से बनने वाले गर्म उत्पादों की लोकप्रियता इस कदर हो गई थी कि बेस्ट वूलन क्लाॅथ के लिए लाल इमली को स्पेन में इंटरनेशनल ग्लोबल अवार्ड मिला था।

राष्ट्रीयकरण (Nationalisation) के बाद, लाल इमली ने “नो प्रॉफ़िट, नो लॉस” मॉडल पर काम करना शुरू कर दिया, जिससे, कीमतें इतनी किफायती थीं कि उपेक्षित वर्ग से लेकर उत्कृष्ट वर्ग जैसे समाज के प्रत्येक तबके इसे खरीद सके। इसने लाल इमली द्वारा उत्पादित ऊनी कपड़ों की लोकप्रियता में भारी वृद्धि को सुनिश्चित किया और इसके परिणामस्वरूप, उसने कॉनपोर वूलेन मिल्स (Cawnpore woolen mills) की अन्य सहायक कंपनियों पर को भी पीछे छोड़ दिया।

मैंचेस्टर ऑफ़ ईस्ट का उत्थान

1857 के सत्ती चौरा विद्रोह में लगभग 300 ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे, और इस घटना के बाद, अंग्रेजों ने कानपुर को एक किले में बदल दिया। शहर में और उसके आसपास सशस्त्र कर्मियों की भारी तैनाती से ऊनी कपड़ों, जूतों, कैनवस टेंट और अन्य कपड़ा सामग्री की अत्यधिक माँग हुई। इन माँगों को पूरा करने के लिए, कॉनपोर वूलेन मिल्स (Cawnpore woolen mills) की स्थापना की गई, और ये मिलें पूरे भारत के लिए सोर्सिंग का केंद्र बन गईं और इसके परिणामस्वरूप, कानपुर ने पूर्व के मैनचेस्टर की उपाधि हासिल की।

नॉक नॉक (Knock Knock)

कहानियों के अनुसार लाल इमली द्वारा उत्पादित गरम कपड़ों का एक सेट इतना गरम और आरामदायक था की कड़ाके की ठण्ड में भी उन्हें पहनकर अक्सर लोगों को पसीना आ जाता था। यहां के स्थानीय लोगों से बात करते हुए ऐसी ही कहानियों के ज़रिये इन ऐतिहासिक स्थलों के रूप में खड़े इन पुरातन कारखानों के बारे में जाने और समझें की भारतीय उद्योग का बीता हुआ समय कितना सुनेहरा था। मशीनें और कारीगर कितने कुशल और समय के कितने आगे थे, कैसे उत्पाद की शुद्धता बनाये रखना उस समय उद्योग की प्राथमिकता थी। और किस प्रकार लाल इमली ने देश विदेश हर कहीं गुणवत्ता का परचम लहराया।

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