अत्तिया हुसैन (Attia Hosain) 
Lucknow-Hindi

लखनऊ में जन्मीं उपन्यासकार अत्तिया हुसैन के लेखन में पार्टीशन से पहले के जीवन का गहन वर्णन है

अत्तिया हुसैन (Attia Hosain) ने एक ऐसे दौर में लिखना शुरू किया, जिसमें ज्यादातर पुरुष लेखकों का वर्चस्व था।

Aastha Singh

लेखक और पत्रकार अत्तिया हुसैन (Attia Hosain) का जन्म 1913 में लखनऊ के एक जानेमाने परिवार में हुआ था। उनके पिता लखनऊ के अवध प्रांत के तालुकेदार थे। उनके पिता की शिक्षा क्राइस्ट कॉलेज (Christ College) में और फिर कैम्ब्रिज (Cambridge) में हुई थी। उनकी माँ का परिवार शास्त्रीय फ़ारसी, अरबी और उर्दू की भाषाओं में निपुड़ था। उनकी माँ लखनऊ में एक महिला शिक्षा और कल्याण संस्थान की संस्थापक थीं। परिणामस्वरूप, अत्तिया का बचपन देश के प्रमुख राजनीतिक बुद्धिजीवियों की संगति में बीता और उन्हें छोटी उम्र से ही फारसी, अरबी और उर्दू सिखाई गई।

उनकी शिक्षा लखनऊ के प्रतिष्ठित ला मार्टिनियर स्कूल (La Martiniere School ) में हुई और बाद में वे इसाबेला थोबर्न कॉलेज (Isabella Thoburn College) से अपनी पढ़ाई पूरी की जो उस समय लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध महिलाओं के लिए एक प्रमुख कॉलेज था। 1933 में 20 वर्ष की आयु में, वह अपने परिवार से पहली महिला बनीं जिन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक किया।

लेखिका के तौर पर उनका जीवन

अत्तिया हुसैन (Attia Hosain)

अत्तिया हुसैन एक प्रमुख भारतीय उपन्यासकार, पत्रकार, प्रसारक और लघु-कथा लेखक थीं और अंग्रेजी में लेख लिखती थीं। उन्होंने कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था और वह पार्टीशन और जेंडर जैसे विषयों के इर्द-गिर्द घुमते हुए अपने लेखन के लिए जानी जाती हैं।

हुसैन के विचार लिबरल थे और 1930 के दशक के राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित थे। वह अपने समय के कट्टरपंथी लेखकों से प्रेरित थीं और इसके चलते वे प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (Progressive writer association ) से जुड़ीं जो लेखकों का एक समूह था जिसमें अहमद अली,सज्जाद जहीर, मुल्क राज आनंद, इस्मत चुगताई, सआदत हसन मंटो और प्रेमचंद जैसे लोकप्रिय और राष्ट्रवादी लेखक शामिल थे।

अत्तिया हुसैन (Attia Hosain)

हुसैन ने एक ऐसे दौर में लिखना शुरू किया, जिसमें ज्यादातर पुरुष लेखकों का वर्चस्व था और अत्तिया को उपमहाद्वीप की प्रारंभिक महिला प्रवासी लेखिकाएं में से एक के रूप में जाना जाता है। जैसा कि लक्ष्मी होल्मस्ट्रॉम (Lakshmi Holm- strom) ने अपने निबंध 'अत्तिया हुसैन: हर लाइफ एंड वर्क', जो की 'इंडियन रिव्यू ऑफ बुक्स' पर प्रकाशित हुआ। भारत में अपने समय के दौरान, हुसैन ने कलकत्ता में स्थित द पायनियर और द स्टेट्समैन जैसे समाचार पत्रों के लिए लिखा, और कई पत्रिकाओं ने उनकी लघु कथाएँ प्रकाशित कीं।

1953 में, फीनिक्स फ्लेड नामक लघु कथाओं का उनका पहला संग्रह प्रकाशित हुआ था। इसमें 'फीनिक्स फ्लेड', 'आफ्टर द स्टॉर्म' और 'द डॉटर-इन-लॉ' जैसी उनकी लघु कथाएँ शामिल हैं। इसके बाद 1961 में प्रकाशित उनका एकमात्र उपन्यास सनलाइट ऑन ए ब्रोकन कॉलम आया।

हुसैन की कलम में भारतीय विभाजन और महिलाओं की व्यथा का ज़िक्र

अत्तिया हुसैन (Attia Hosain)

एक कुलीन मुस्लिम होने के बावजूद, उनके कट्टरपंथी विचारों ने उन्हें स्त्रियों के खिलाफ अपने वर्ग के पाखंडों को पहचानने में सक्षम बनाया - एक ऐसा विषय जो उनके कार्यों में प्रमुख रूप से दिखाई देता है उनकी लघु कहानी 'द फर्स्ट पार्टी' परंपरा और आधुनिकता के बीच संघर्ष को बयान करती है क्योंकि एक युवा दुल्हन अपने पति की आधुनिक जीवन शैली के साथ कदम मिलाने की कोशिश करती है। अनीता देसाई, जिन्होंने उनकी रचना 'सनलाइट ऑन ए ब्रोकन कॉलम' (Sunlight on a Broken Column) का परिचय लिखा है, ने "गहन और अलंकृत" होने के लिए हुसैन के लेखन की बहुत प्रशंसा की है।

अत्तिया हुसैन (Attia Hosain)

उनका उपन्यास 'सनलाइट ऑन ए ब्रोकन कॉलम' (Sunlight on a Broken Column) भी उनके अपने जीवन के अनुभवों को दर्शाता है। यह भारत के पार्टीशन की पृष्ठभूमि के खिलाफ लिखा गया है और एक ढहती सामाजिक व्यवस्था को दर्शाता है।1961 चट्टो और विंडस द्वारा प्रकाशित,यह मुख्य चरित्र लैला के जीवन का पता लगाता है, जो एक सामंती तालुकदारी, परिवार में पली-बढ़ी है।

हुसैन का लेखन पूर्व-विभाजन भारत में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को दर्शाता हैं। ज़ेनाना की अवधारणा और पर्दा पालन करने की प्रथा का वर्णन उनके उपन्यास के पारंपरिक मुस्लिम परिवार के माध्यम से किया गया है। अतिया हुसैन ने मुख्य रूप से महिलाओं के अनुभवों के बारे में लिखा और पितृसत्तात्मक समाज में उनकी स्थिति को दर्शाया है।

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