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इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्देश, बिना नोटिस के किसी को भी थाने पर नहीं बुला सकती पुलिस

थाना प्रभारी की सहमति/अनुमोदन के बिना किसी आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों द्वारा मौखिक रूप से पुलिस थाने में नहीं बुलाया जा सकता है।

Pawan Kaushal

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आदेश पारित करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को बिना लिखित नोटिस दिए थाने में नहीं बुला सकती। कोर्ट ने आदेश पारित करते हुए पुलिस द्वारा किसी भी व्यक्ति को बिना एफआईआर दर्ज हुए, थाने बुलाए जाने पर रोक लगा दी है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत नोटिस जारी करने के उपरांत ही किसी को थाने पर बुलाया जाए। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि अधीनस्थ पुलिसकर्मी थाना इंचार्ज के अनुमति से ही ऐसी नोटिस जारी कर सकते हैं। कोर्ट ने इस आदेश की एक प्रति अपर मुख्य सचिव गृह को भेजने का निर्देश दिया है।

जस्टिस अरविंद कुमार मिश्रा- I और जस्टिस मनीष माथुर ने जारी किया निर्देश

यह आदेश जस्टिस अरविंद कुमार मिश्रा, प्रथम व जस्टिस मनीष माथुर की बेंच ने सरोजनी नाम की एक लड़की के पत्र को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के तौर पर दर्ज करते हुए, पारित किया। कोर्ट ने अपने आदेश में जोर देकर कहा कि पुलिसकर्मी के महज मौखिक आदेश पर किसी भी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता व सम्मान को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता।

जस्टिस अरविंद कुमार मिश्रा- I और जस्टिस मनीष माथुर की खंडपीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया, "यदि किसी पुलिस स्टेशन में कोई आवेदन या शिकायत दी जाती है, जिसमें जांच और आरोपी की उपस्थिति की आवश्यकता होती है तो आपराधिक प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के तहत निर्धारित कार्रवाई का पालन किया जाना चाहिए, जिसमें ऐसे व्यक्ति को लिखित नोटिस भेजे जाने पर विचार किया गया है, हालांकि यह भी मामला दर्ज होने के बाद ही किया जा सकता है।"

इसके साथ ही कोर्ट ने ये निर्देश जारी करते हुए जोर देकर कहा कि किसी भी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा को केवल पुलिस अधिकारियों के मौखिक आदेश पर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता है।

सरोजनी नाम की लड़की ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति को पत्र भेज कर की थी शिकायत

आपको बता दें कि सरोजनी नाम की लड़की ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति को पत्र भेज कर शिकायत की थी कि उसके माता-पिता को 8 अप्रैल को महिला थाना लखनऊ पर फोन कर पुलिस ने बुलाया। वहां जाने पर माता-पिता को अवैध तरीके से हिरासत में ले लिया गया है। बताया कि पुश्तैनी सम्पत्ति का विवाद उसके माता-पिता और भाई-भाभी के बीच चल रहा है और इसी विवाद में माता-पिता को बुलाया गया था। पत्र में इस बात का भी जिक्र किया गया कि महिला थाने में मौखिक रूप से बुलाने और वहां से ना लौटने की बात भी कही गई थी।

कोर्ट ने राज्य और उसकी संस्थाओं को निर्देश जारी किए

  • यदि किसी पुलिस थाने में कोई आवेदन या शिकायत दी जाती है जिसमें जांच और आरोपी की उपस्थिति की आवश्यकता होती है तो दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के तहत निर्धारित कार्रवाई की उपयुक्त प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए जो ऐसे व्यक्ति को लिखित नोटिस पर विचार करता है लेकिन वह भी मामला दर्ज होने के बाद ही।

  • यदि उस समय कोई जांच अधिकारी नहीं है, तो अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों को ऐसा नोटिस या समन जारी करने से पहले थाना प्रभारी की अनुमति/अनुमोदन लेना आवश्यक है।

  • थाना प्रभारी की सहमति/अनुमोदन के बिना किसी आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों द्वारा मौखिक रूप से पुलिस थाने में नहीं बुलाया जा सकता है।

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