मध्य प्रदेश के लोक कला नर्तक 'राम सहाय पांडेय' ने हर मुश्किल का सामना कर अपनी कला को अंतरराष्ट्रीय मुकाम दिलवाया

मध्य प्रदेश के लोक कला नर्तक 'राम सहाय पांडेय' ने हर मुश्किल का सामना कर अपनी कला को अंतरराष्ट्रीय मुकाम दिलवाया

लोक कला नृत्य राई का अभ्यास करने वाले रामसहाय पांडेय की कहानी हमें यह सन्देश देती है की अभाव में ही आविष्कार होते हैं।
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''जहां हम खड़े हो जाते थे, वहां लोग पानी से जमीन धो देते थे'', ये बयान नहीं आपबीती है मध्य प्रदेश के सागर जिले में पठा गांव के रहने वाले 'राम सहाय पांडे' की। 94 वर्षीय लोक कलाकार राम सहाय पांडे वह शख्सियत हैं जिन्होंने मध्य प्रदेश की लोक कला 'राई नृत्य' को बुंदेलखंड के मंचों से उठाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। राम सहाय पांडे और उनकी कला के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में भारत सरकार की ओर से उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया है। विडंबना का विषय तो ये है की देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार मिलने के बाद भी राम सहाय समाज में रूढ़ीवादी सोच और जातिवाद के ताने झेल रहे हैं।

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