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उत्तर भारत में बॉलीवुड से पहले 'नौटंकी' ही मनोरंजन का बड़ा माध्यम था जो अब अपनी विरासत खो रहा है

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उत्तर प्रदेश में उत्पन्न हुई नौटंकी की कला में स्पष्ट और नज़ाकत भरे इशारों के साथ मधुर भाषण का इस्तेमाल किया जाता है।

Aastha Singh

नौटंकी (Nautanki) कला नृत्य, संगीत, कहानी, हास्य, संवाद, नाटक और बुद्धि का मिश्रण है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उत्तर प्रदेश में उत्पन्न हुई इस कला में स्पष्ट और नज़ाकत भरे इशारों के साथ मधुर भाषण का इस्तेमाल किया जाता है। ये नाटक सूक्ष्म और सटीक तरीके से लिखे जाते थे और और इसके नायक असाधारण रूप से कुशल अभिनेता और गायक थे। पूरे उत्तर भारत में सिनेमा के आने से पहले 'नौटंकी' (Nautanki) ही सबसे लोकप्रिय कला थी। आज के सिनेमा को नाट्य कला (theatrical art) के नगीने देने में 'नौटंकी' (Nautanki) की विशेष भूमिका रही है।

बहुत कम प्रॉप्स का उपयोग होने के बावजूद, अभिनेता अपनी विलक्षण प्रतिभा से नदियों, जंगलों, युद्धों और शाही दरबारों का निर्माण किया करते थे। प्रदर्शन खुले मैदान में, मेक-शिफ्ट मंच पर आयोजित किए जाते थे, और जैसे ही अभिनेता अपनी वेशभूषा में सजते थे और शो शुरू होता था, वैसे ही सभी आयु वर्ग के लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

जीवन का रंगमंच

नौटंकी (Nautanki) की उत्पत्ति सबसे पहले उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई। 1910 के दशक तक, कानपुर और लखनऊ नौटंकी के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन गए थे और प्रत्येक शहर ने एक विशिष्ट शैली विकसित की थी। नौटंकी ने शुरू से ही किंवदंतियों, संस्कृत और फारसी रोमांस और पौराणिक कथाओं सहित साहित्य और परंपरा को विस्तृत रूप से मंच पर प्रदर्शित किया और सबसे भावनात्मक तरीके से जनमानस तक पहुँचाया।

कुछ सबसे लोकप्रिय नौटंकी राजा हरिश्चंद्र, लैला मजनू, शिरीन फरहाद, श्रवण कुमार, हीर रांझा और बंसुरीवली थे। जबकि पृथ्वीराज चौहान, अमर सिंह राठौर और रानी दुर्गावती जैसे ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित नाटक भी काफी लोकप्रिय थे।

कलाकारों और नाटकों का एकजुट समुदाय

नौटंकी (Nautanki) ने मनोरंजन के मुख्य स्रोत के रूप में कार्य किया, साथ ही अपने किस्सों और कहानियों के भीतर नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों को स्थापित किया और कुछ कारणों के लिए प्रासंगिक संदेश दिया। उत्तर भारत में, नौटंकी (Nautanki) ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान एक सुधारवादी भूमिका निभाई। यह अपने-अपने पूरे अवध में देशभक्ति और पराक्रम की कथाओं वाले नाटकों का अभिनय करके नौटंकी कला ने राष्ट्रीय आंदोलन में एक अभूतपूर्व योगदान दिया।

नौटंकी (Nautanki) का असर लोगों पर ऐसा था कि जब लैला मजनू की प्रेमकहानी में पागल होने के बाद पहली बार मजनू लैला से मिला तो थिएटर में चीख-पुकार मच गई। जब फरहाद शिरीन फरहाद में शिरीन की कब्र पर अपना सिर पीटता, या जब सुल्ताना सुल्ताना डाकू में ब्रिटिश पुलिस आयुक्त को चकित करती, तो दर्शकों में एक बहुत मजबूत भावना पैदा होती थी। ऐसे हर पल में अभिनेता और दर्शक एक हो जाते थे और बीच की अंतर की दीवार टूट जाती थी।

रंगमंच के रंग फिज़ाओं में जीवित रहने चाहिए

नौटंकी (Nautanki) की कला ने भारतीय सिनेमा को अनेक नगीनों से नवाज़ा है। संगीत, मेलोड्रामा, अच्छाई और बुराई के बीच का अंतर, शाही दरबार की किस्सों को मंच से पर्दे पर आयात किया जाने लगा। 1960 के दशक तक, सिनेमा मनोरंजन का प्रमुख माध्यम बन गया था, और 1990 के दशक तक, लगभग सभी मौजूदा नौटंकी (Nautanki) कंपनियों के शटर बंद हो गए थे।

हालाँकि, यह नहीं कहा जा सकता है कि कला का यह रूप पूरी तरह से कम हो गया है, क्योंकि हाल के दिनों में नौटंकी (Nautanki) में फिर से लोगों की रूचि बढ़ी है। ग्रेट गुलाब थिएटर कंपनी, कृष्णा कला केंद्र, बीएलएम और मिशन सुहानी जैसी कंपनियां कभी-कभी प्रदर्शन करती हैं। नुक्कड़ नाटकों ने समकालीन तत्वों को आधुनिक तरीकों में मिलाकर और आधुनिक दर्शकों को प्रभावित करने वाले वर्तमान मुद्दों के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानियों को बताकर कला को काफी हद तक जीवित रखने में कामयाबी हासिल की है।

नौटंकी को जीवित रखने का संघर्ष इस बात में है की किस प्रकार नौटंकी के मूल कला रूप के पारंपरिक तरीकों और कलात्मक भावों की रक्षा करने की कोशिश के साथ ही भावनाओं की भाषा में बात करके कहानी और संदेश को आधुनिक दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना जाए।

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