निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार
जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हें, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़!
कवि – हरिवंश राय बच्चन
इन पंक्तियों को पढ़कर यह समझ आता है की भाग्य और ईश्वर भी उन्ही का साथ देते हैं जिनके भीतर अपने अधिकारों के लिए लड़ने की क्षमता होती है। वैसे तो इस दुनिया में किसी को हक़ नहीं है की किसी व्यक्ति से अपने हिस्से के जीवन को खुलकर जीने की आज़ादी को छीनने का। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सच यही है की हम समाज के लोगों ने क्वीर (queer) जीवन को सामाजिक मानदंडों के शिकंजे के बीच जकड़ रखा है।
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कुछ ऐसे व्यक्ति जो लिंग के मानदंडों की सीमित दुनिया से अलग एक ऐसा जीवन बिताना चाहते हैं जहाँ उन्हें अपने सच्चे व्यक्तित्व को सामने रखने के लिए जद्दोजहद न करनी पड़े। हालांकि आगे की लड़ाई में अभी भी एक लंबी और कठिन यात्रा शामिल है, हम LGBTQIA+ लोगों के मुद्दों को उनके नज़रिये से समझकर एक ऐसा वातावरण बना सकते हैं जहाँ इंसान को इंसान समझा जाए और उन्हें ये विश्वास दिलाया जाए की वे अपने कमज़ोर पलों में भी बेहतर हैं और सबसे मज़बूत हैं।
तो, यहाँ 5 दिल को छू लेने वाली शार्ट फिल्मों का ज़िक्र हैं जो लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों के क्वीर (queer) व्यक्तियों की दास्ताँ बयां करती हैं, जो आपके दिल और दिमाग में अपना एक अंश अवश्य छोड़कर जाएंगी !
















